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चुनावी बयार में मायावती का ‘ओबीसी दांव’, जनगणना को लेकर सकारात्मक कदम पर देंगी समर्थन

विधानसभा चुनाव से पहले उप्र में तेज होने लगी ओबीसी सियासतलखनऊ। ओबीसी समाज की अलग से जनगणना की मांग को लेकर सियासत तेज होती जा रही है। बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने भी इसका समर्थन किया है।

मायावती ने शुक्रवार को कहा कि देश में ओबीसी समाज की अलग से जनगणना कराने की मांग बीएसपी शुरू से ही लगातार करती रही है तथा अभी भी बीएसपी की यही मांग है। उन्होंने कहा कि इस मामले में केन्द्र की सरकार अगर कोई सकारात्मक कदम उठाती है तो फिर बीएसपी इसका संसद के अन्दर व बाहर भी जरूर समर्थन करेगी।

दरअसल केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय बीते दिनों लोकसभा में एक जवाब में कह चुके हैं कि फिलहाल केन्द्र सरकार ने अनुसूचित जाति और जनजाति के अलावा किसी और जाति की गिनती का कोई आदेश नहीं दिया है। इस बार भी अनुसूचित जाति और जनजाति को ही जनगणना के दायरे में रखा गया है। इसके बाद से ही विपक्षी दल सरकार को घेरने में जुट गए हैं। यहां तक की एनडीए के कुछ सहयोगी दल भी जातिगत जनगणना कराये जाने के समर्थन में है।

देखा जाए तो वर्ष 1931 तक भारत में जातिगत जनगणना होती थी। वहीं 1941 में जनगणना के समय जाति आधारित डेटा जुटाने के बावजूद प्रकाशित नहीं किया गया। इसके बाद वर्ष 1951 से 2011 तक की जनगणना में हर बार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का ही डेटा दिया गया। वर्ष 1990 में तत्कालीन विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार ने ‘मंडल आयोग’ की सिफारिश को लागू किया, जिसमें अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों को सरकारी नौकरियों में सभी स्तर पर 27 प्रतिशत आरक्षण देने की बात थी। इसके बाद इसके पक्ष और विरोध दोनों में उत्तर भारत की सियासत गरमा गई।

मंडल कमीशन के आंकड़ों के मुताबिक भारत में ओबीसी आबादी 52 प्रतिशत है। हालांकि ये आंकड़े 1931 की जनगणना पर आधारित है। अब ओबीसी की आबादी के वास्तविक प्रतिशत को लेकर कोई ठोस प्रमाण नहीं है। सियासी दल अपने फायदे के लिए ये आंकड़े कम-ज्यादा बताते रहे हैं। वहीं अहम बात ये भी है कि केन्द्र सरकार की गई नीतियों का आधार जाति रहा है। नीट परीक्षा इसका ताजा उदाहरण है, जिसके ऑल इंडिया कोटे में ओबीसी के लिए आरक्षण लागू करने की बात केन्द्र सरकार ने कही है। इसके बावजूद अगर सरकार ऐसी जनगणना कराने से इनकार कर रही है तो इसके पीछे कई कारण और सियासी मजबूरी भी है।

दरअसल ऐसी जनगणना होने पर ओबीसी की आबादी घटने और बढ़ने दोनों का असर सियासी समीकरणों पर पड़ेगा। अगर प्रतिशत घटता है तो ओबीसी नेता अपनी सियासत के लिए इन आंकड़ों को गलत बताने से परहेज नहीं करेंगे। वहीं अगर ओबीसी का प्रतिशत बढ़ता है तो वह इनकी आबादी का हवाला देकर और आरक्षण की मांग करेंगे। इसके साथ ही ओबीसी जनगणना सार्वजनिक होने पर ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ जैसी सियासत को भी और हवा मिल सकती है।

इसके साथ ही ऐसी जनगणना का असर सरकार की योजनाओं और नीतियों पर पड़ना भी स्वाभाविक है। इसी तरह केन्द्र और राज्यों में ओबीसी जाति को लेकर भी अन्तर है। कुछ जातियां राज्यों में ओबीसी के दायरे में आती हैं, लेकिन केन्द में वह सूची के बाहर हैं। ऐसे में इस पर भी एक नया विवाद हो सकता है।

सरकार ऐसी किसी भी मुश्किल में नहीं पड़ना चाहती। इसलिए वह इससे इनकार कर रहे हैं। दूसरी ओर विपक्ष इस सियासत के जरिए केन्द्र पर दबाव बनाने का अवसर नहीं खोना चाहता। खासतौर पर ओबीसी वर्ग से जुड़े नेता इसको लेकर लगातार बयानबाजी कर रहे हैं। चुनावी माहौल में वह अपनी वोटबैंक की सियासत को लेकर और आक्रामक हो रहे हैं।

मायावती का ताजा बयान इसी का हिस्सा है। दलित राजनीति का बड़ा चेहरा रहीं बसपा सुप्रीमो अब सत्ता की खातिर सोशल इंजीनियरिंग की राह पर हैं। वहीं वह ओबीसी वर्ग की सियासी ताकत को भी अच्छी तरह समझती हैं। इसलिए इनकी जनगणना की मांग को समय समय पर हवा देकर इस वर्ग का भी समर्थन लेना चाहती हैं। सूत्रों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में टिकट बंटवारे के लिए पार्टी के नए फॉर्मूले के मुताबिक ओबीसी तबके को प्राथमिकता देने की रणनीति है। इसके तहत प्रदेश के हर जनपद में एक से दो दमदार ओबीसी उम्मीदवारों को टिकट दिया जा सकता है। वहीं सपा और कांग्रेस भी चुनाव को लेकर इसे भाजपा के खिलाफ मुद्दा बनाने में लगी हैं।

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