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ओवैसी संग मोर्चा बनाकर ओमप्रकाश राजभर को याद आई पुरानी दोस्ती, स्वतंत्र देव से मिलकर की चर्चा

विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा-सुभासपा के बीच पक रही सियासी खिचड़ी


लखनऊ।
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले सियासी खिचड़ी पकना शुरू हो गया है। जो दल एक दूसरे की आलोचना करते नहीं थकते थे, उनके भी सुर एक दूसरे के प्रति बदले-बदले नजर आ रहे हैं। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह की मंगलवार को हुई मुलाकात के बाद सियासी गलियारों में नये समीकरण बनने की चर्चाएं तेज हो गई हैं।

भाजपा के साथ मिलकर लड़ा था पिछला विधानसभा चुनाव

सुभासपा ने 2017 विधानसभा चुनाव भाजपा गठबंधन के साथ लड़ा था। इसके बाद ओमप्रकाश राजभर कैबिनेट मंत्री भी बनाए गए, उनकी पार्टी के लोग राज्यमंत्री और निगमों के अध्यक्ष भी थे। लेकिन, यह सियासी दोस्ती ज्यादा समय तक परवान नहीं चढ़ सकी और राजभर ने सरकार से किनारा कर लिया। इसके बाद से ही वह पार्टी नेतृत्व पर लगातार हमलावर बने हुए हैं। वहीं मंगलवार को जिस तरह से उनकी और स्वतंत्र देव सिंह की एक घंटे तक बातचीत हुई, उससे दोनों दलों की सियासी दोस्ती फिर परवान चढ़ने की अटकलें तेज हो गई हैं।

ओवैसी के साथ संकल्प मोर्चा बनाकर भाजपा से दोस्ती की राह

दरअसल ओमप्रकाश राजभर की ये मुलाकात इसलिए भी अहम है, क्योंकि प्रदेश में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के साथ वह भागीदारी संकल्प मोर्चा बनाकर काम कर रहे हैं। इससे पहले कि इसके जरिए नये समीकरण देखने को मिलते, राजभर को अपनी पुरानी दोस्ती याद आ गई है। हालांकि उन्होंने इस मुलाकात को महज औपचारिक भेंट बताया और कहा कि स्वतंत्र देव सिंह पहले पिछड़ों के नेता हैं उसके बाद भाजपा प्रदेश अध्यक्ष। यह मुलाकात निजी थी लेकिन कुछ लोग अर्थ का अनर्थ लगाएंगे।
राजभर ने कहा कि ऐसे लोगों से मैं कहना चाहता हूं कि आने वाले विधानसभा चुनाव में सुभासपा ही भाजपा को नेस्तनाबूत करेगी। उन्होंने कहा कि राजनीति में कौन-कौन क्या कर रहा है, इसकी थाह समय-समय पर लेते रहना चाहिए। दो बड़े नेता व्यक्तिगत मुलाकात भी कर सकते हैं। जब ममता बनर्जी और सोनिया गांधी मिल सकती हैं, जब मायावती और अखिलेश मिल सकते हैं तो राजनीति में कुछ भी संभव है।

चुनाव से पहले ही क्यों की मुलाकात

राजभर ने कहा कि हम जनगणना में पिछड़ी जातियों को जातिवार कॉलम में भाजपा के निर्णय के खिलाफ थे। इसके साथ ही हम सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट को लागू कराने के पक्ष में हैं। पिछड़ों के लिए एक समान शिक्षा, गरीब व कमजोर के लिए अनिवार्य शिक्षा, महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण और शराबबंदी हमारे मुद्दे हैं, अगर भाजपा इन सभी मांग को मान लेती है तो फिर हम भी मान जाएंगे। ओमप्रकाश राजभर की इसी लच्छेदार भाषा ने आगे की राजनीति को लेकर कई अटकलों को जन्म दे दिया है। सियासी पंडित इसके मायने निकालने में जुट गए हैं। दरअसल राजभर भले ही इसे निजी मुलाकात बता रहे हैं। उन्होंने स्वतंत्र देव सिंह को भी पिछड़ों का बड़ा नेता बताया है। लेकिन, ये सब उन्हे विधानसभा चुनाव से ऐन पहले ही क्यों याद आया, ये बड़ा सवाल है। सियासत में सब कुछ उतना सीधा-सपाट होता नहीं है, जैस कि वह दिखाना चाह रहे हैं।

पिछड़ा वोटबैंक को लेकर हो रही सियासत

ओमप्रकाश राजभर ने कहा कि भागीदारी संकल्प मोर्चा सरकार बनाने को अग्रसर है। प्रदेश में अति पिछड़ी तथा 70 प्रतिशत पिछड़ी जातियां काफी उपेक्षित थीं। यह किसी को भी सरकार बनाने में मदद करती हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश की 45 प्रतिशत ओबीसी जातियां हमारे साथ हैं, हम इसी दम पर सरकार बनाएंगे। उन्होंने समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी के लिए भागीदारी संकल्प मोर्चा के दरवाजे खुले होने की भी बात कही।

 

एक तरफ ओवैसी-एक तरफ भाजपा भागीदारी संकल्प मोर्चा की हकीकत: कांग्रेस

वहीं इस मुलाकात को लेकर कांग्रेस ने सवाल उठाये हैं। पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया पैनलिस्ट सुरेन्द्र राजपूत ने कहा कि भाजपा से लेकर ओवैसी तक यह कौन सी भागीदारी का संकल्प हो रहा है। उन्होंने ओम प्रकाश राजभर से सवाल किया कि क्या भाजपा ने उन्हें यह मोर्चा बनाने को कहा है कि ये एक तरफ ओवैसी रहें और एक तरफ आप भाजपा नेताओं से मिलें। उन्होंने कहा कि भाजपा की इस साजिश का खुलासा करना होगा। जनता के सामने ये बात रखनी होगी कि राजभर के जरिए भाजपा सारे लोगों को साधना चाहती है। अब भाजपा व ओवैसी का खेल एकदम सामने आ चुका है कि ये एक दूसरे के पूरक हैं।

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