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तालिबान: तीन सदी में तीसरी बार महाशक्ति का अभिमान हुआ चूर, भारत की क्या होगी रणनीति

तालिबान: तीन सदी में तीसरी बार महाशक्ति का अभिमान हुआ चूर, भारत की क्या होगी रणनीति

काबुल। अफगानिस्तान में तालिबान को वर्ष 2001 में सत्ता से बेदखल करने वाले अमेरिका ने कभी सोचा नहीं था कि तालिबानियों के बढ़ते प्रभाव के कारण कभी उसकी सेना को अपना बोरिया बिस्तर लेकर वापस लौटने पर मजबूर होना पड़ेगा। जो अमेरिका दुनिया के सामने अपनी ताकत का प्रदर्शन करने से नहीं चूकता, वह एक छोटे से मुल्क के लड़ाकों से कैसे हार गया, ये सबक उसे हमेशा याद रहेगा।

अमेरिका से पहले ब्रिटेन और फिर सोवियत संघ भी इसी तरह मुंह की खा चुके हैं। इस तरह पिछली तीन सदी में ऐसा तीसरी बार हुआ जब किसी महाशक्ति का अभिमान चूर-चूर हुआ हो। अमेरिका इस जंग में 750 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च करने और अपने हजारों सैनिकों को गंवाने के बाद वापसी को मजबूर हुआ है। वैसे इसकी पटकथा 2018 से ही लिखा जाना शुरू हो गया था। तालिबान ने अमेरिका के साथ वर्ष 2018 में बातचीत शुरू की थी। वहीं फरवरी, 2020 में दोहा में दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते में अमेरिका ने अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को हटाने की बात कही।
अंतराष्ट्रीय स्तर पर इस बदले परिदृश्य में अलग-अलग खेमों में उलझे मुल्कों के बीच भारत को देखें तो पिछले कुछ सालों में भारत सरकार ने अफगानिस्तान में पुनर्निर्माण से जुड़ी परियोजनाओं में लगभग तीन अरब अमेरिकी डॉलर निवेश किये हैं। एक तरह से अफगानिस्तान को संवारने में भारत बेहद अहम भूमिका निभा रहा था। वह एक सच्चा दोस्त बनकर अपना फर्ज अदा करने में लगा था। लेकिन, अब बदले हुए हालातों में उसकी भूमिका पर सभी की निगाहें लगी हुई हैं।

भारत के पास विकल्पों की बात की जाए तो तालिबानी शासन में वह अफगानिस्तान में पुननिर्माण की अपनी भूमिका तालिबानियों के साथ मिलकर जारी रख सकता है या फिर अपने पिछले दो दशकों में किए काम को भुला दे। ऐसा करना अपने किये हुए को ही मिटते हुए देखना होगा। यानि दो देशों के बीच विकास का जो सकारात्मक रिश्ता था, एक तरह से उसे खत्म होते देर नहीं लगेगी। खासतौर से पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी मुल्क यही चाहते हैं कि तालिबानी शासन में भारत की वैसी भूमिका नहीं रहे, जो अफगानी सरकार में थी।

अतीत के पन्नों में झांके तो 1990 में जब अफगानिस्तान में तालिबान का शासन था और भारत ने अपने दूतावास बंद कर दिए थे, तब इसके नकारत्मक परिणाम भी देखने को मिले थे। कंधार विमान अपहरण कांड अभी देश की जनता को याद है। इसी तरह भारत विरोधी गुट भी बेहद सक्रिय हो गए थे। वहीं 2011 से भारत ने अफगानिस्तान में जो अपनी सकारात्मक भूमिका निभायी है, उसे अंतराष्ट्रीय बिरादरी के साथ तालिबान ने भी स्वीकार किया है। तालिबान में एक गुट भारत के प्रति सहयोग वाली भूमिका में भी रहना चाहता है।

अंतराष्ट्रीय मसलों के विशेषज्ञों के मुताबिक अभी कुछ भी कहना बेहद जल्दबाजी होगी। पाकिस्तान, रूस, चीन से इतर भी दुनिया है और अन्य मुल्कों का तालिबान के प्रति और तालिबान का अन्य देशों के प्रति क्या रवैया रहेगा, आगे की भूमिका काफी हद तक इस पर निर्भर रहेगी। तालिबान भी अब पहले वाली भूूमिका के बजाय नये चेहरे के रूप में सामने आया है। लेकिन, अंदरूनी तौर पर उसकी सोच कैसी है, यह कुछ समय बाद ही साफ हो सकेगा। मुमकिन हो तालिबान अभी वैश्विक स्वीकार्यता हासिल करने की चाह में मुखौटा पहने हुए हो।

तालिबान को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच समर्थन की दरकार है। कई मुल्क अभी भी अन्तिम निर्णय की स्थिति में नहीं हैं। वही सही समय का इंतजार कर रहे हैं। भारत भी लगभग इसी भूमिका में है। लेकिन, ये भी एक बड़ा सच है कि भारत और तालिबान के सकारात्मक सम्बन्ध आज की जरूरत भी हैं और जरूरी भी। चीन और पाकिस्तान का तालिबानियों के साथ प्रेम जितना गहरा होगा, भारत पर दबाव उतना ही ज्यादा होगा। ऐसे में भारत सधे हुए अन्दाज में तालिबान से अपने रिश्ते बनाकर इन दोनों देशों के दबाव को कम करने का रास्ता निकाल सकता है।

तालिबान से भारत के रिश्ते सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी मायने रखेंगे, क्योंकि तालिबान के साथ सम्बन्धित आतंकी गुट जैश, लश्कर और हक्कानी नेटवर्क भारत विरोधी हैं। ऐसे में तालिबान से सम्बन्ध खराब होने की स्थिति में ये भारत विरोधी गतिविधियों में और सक्रिय रह सकते हैं। पाकिस्तान अपने जन्म के बाद से ही भारत विरोधी है। चीन की नापाक हरकतें भी किसी से छिपी नहीं हैं। सीमा विवाद को लेकर उसका छल सामने भी आ चुका है। ऐसे में भारत के लिए तालिबान से अपने सम्बन्धों को नई दिशा देना जरूरी हो भी जाता है।

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इस बीच भारतीय विदेश मंत्रालय मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा है कि कि भारतीय नागरिकों के अफगानिस्तान से भारत लौटने व अन्य मामलों के लिए एक विशेष अफगानिस्तान सेल का गठन किया है। हर स्थिति पर भारत सरकार बहुत ही करीबी नजर रखे हुए है। जानकारी के मुताबिक कुछ भारतीय अभी भी वहां फंसे हुए हैं, मंत्रालय उनके साथ सम्पर्क में हैं। इसके साथ ही भारत सरकार वहां के हिन्दू और सिख समुदाय के लोगों के साथ भी सम्पर्क में है, जो भी अफगानिस्तान छोड़कर भारत आना चाहता है हम उन्हें सुविधा मुहैया कराएंगे।

 

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