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दुआएं इतनी कि ‘थैंक्यू’ छोटा पड़ जाए: ‘हैगोय यो धणियोंपात रूण दिओ, के बात नि भै’

बुजुर्गों की बातें,रीति-रिवाज, धीरे धीरे बनते जा रहे इतिहास

अल्मोड़ा। आमतौर पर किसी व्यक्ति द्वारा मदद किए जाने पर हम ‘धन्यवाद’ बोलकर उसका आभार जताते हैं। लेकिन, पहाड़ की बोलचाल में इस शब्द का प्रयोग किए बिना भी बुजुर्ग अपना भाव प्रकट कर देते थे। धन्यवाद की जगह सामने वाले को इतनी दुआएं, शुभाशीष दिए जाते कि ‘थैंक्यू’ शब्द छोटा पड़ जाता। इसलिए पहाड़ की पारम्परिक बोलचाल में धन्यवाद शब्द से एक तरह से परहेज किया जाता रहा।

उदाहरण के तौर पर किसी ने मदद कर दी तो उसके बदले कहा जाता है,’तुमर भल हैजौ, तुमर नानतिन बची रून, तुमर खुटन कान् ले झन बुड़ो।’ अगर एहसान ज्यादा ही हुआ तो कहेंगे, ‘तुमरि एकै एकैस पांचै पंचैस हैजौ, जै जै कारी हैजौ।’ बाद में जब धन्यवाद शब्द चला तो शुरु में लोग मजाक में कहते, ‘हैगोय यो धणियोंपात रूण दिओ, के बात नि भै।’

इसी तरह देवभूमि उत्तराखण्ड में मिठाई का मतलब गुड़ होता था। लोग कहा करते थे, ‘ पास हैगो बल तुमर च्योल, गुड़ खिलाओ।’ यहां भी जवाब में धन्यवाद नहीं कहा जाता था। कहते, ‘ होय हैगो पें तुमार आशीर्वादैलि, घर आया एक आंगू पिठ्या लगै ल्हिजाया और गुड़ ले खै जाया।’ हर खुशी के मौके पर गुड़ बांटा जाता था और बधाई देने आये व्यक्ति या महिला को पिठ्या (टीका) भी लगाया जाता। कई बार अगर दोपहर या शाम को लोग बधाई देने किसी के घर जाते तो वहां पिठ्या लगता, तो वापस जाने पर रास्ते में लोग पूछते कि, ‘कि बात बड़ चर-बर पिठ्या लगै राखौ।’ चर बर मतलब लम्बा चौड़ा गहरा। तब वह बताता कि अरे फलाने का नाती हुआ है। वहां गया था।

इससे एक बात और होती कि लोगों को धीरे-धीरे ये खुशखबरी मिल जाती। लोग अपने आप बधाई देने निकल पड़ते। बधाई देने को ‘भलि भट्यूण कहते थे। बधाई भी प्रचलन में नहीं था। बधाई के लिए प्रयुक्त होता- ‘भल भै तुमर नाति हैगो, भल भै तुमर च्योल पास हैगो, भल भै तुमर च्योल क ब्या ठरी गो।’ जवाब वही होता, ‘होय यो सब तुम लोगनक आशीर्वाद छ।’ कल्पना कीजिए बधाई है, धन्यवाद, की जगह जब इन आत्मीयता वाले शब्दों का प्रयोग होता होगा तो कितना सुख कितने अपनेपन का अहसास होता होगा।

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किसी के पास होने पर, लड़का, लड़की होने पर, बच्चों की शादी तय होने पर, शादी हो जाने पर, नौकरी लगने पर. जनेऊ होने पर, किसी का लापता सदस्य पुन: घर वापसी पर ‘भलि भट्याने’ का प्रचलन था, वो भी उसके घर जाकर। इसके लिए कुछ अच्छे वार यानि दिन तय थे। शनिवार, मंगलवार भलि भट्याने के लिए वर्जित थे। घर वाले भी अनुमान लगाते कि आज मंगलवार है, कोई नहीं आएगा, फलां काम निपटा लो। या ‘आज भल वार छ, मैंस भल भट्यूण आल आज घरै रया सब लोग।’ साथ में जब भल भट्याने लोग आते तो चाय की केतली पूरे दिन के लिए रौन पर चढ़ जाती। घर के सारे सदस्य आवभगत में लग जाते। महिलाएं भीतर चाय पानी पीती बड़े बुजुर्ग आये होते तो उनके लिए ह्वाक चिलम में तम्बाकू कोयले सज जाते ।

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एक बात और होती कि जिसके यहां परिवार छोटा हो, महिला एक ही हो तो वहां पर भल भट्याने आई महिलाएं मदद भी करती थी। जैसे चाय बना देना, प्रसूता के लिए कुछ पका देना, गायों को पानी देना, क्योंकि घर की गृहणी तो मेहमानों को पो पिठ्या लगाने गुड़ बांटने में ही लगी रह जाती। यहीं पर अगर किसी के घर बच्चा हुआ हो तो घर की मुखिया गृहणी भलि भट्याने आई महिलाओं को शाम को आकर गीत गाकर जाने का न्योता भी दे देती।

यहीं पर दुणआंचव के कुछ पैसे और एक कागज की पुड़िया में घर के लिए गुड़ दे दिया जाता। बड़े बुजुर्ग जवान लोग चर्चा करते, ‘नामकरण में कदु आदिम खवाला, हमार हात क काम बताया, क्वे नानतिनै हात ले जवाब भेज दिया। हम बीच बीच में आते रूल।’ आज की तरह नहीं होता कि पार्टी कब दे रबे हो। शाम को कहां मिलोगे, तब ये चीजे निषेध थी। तब एक परम्परा और थी-यदि परिवार में, बिरादरी में, नजदीकी रिश्तेदारी में एक साथ दो बच्चे नामकरण की अवधि तक भी हो गये तो उन बच्चों को औ छौ कहा जाता था। बाद में एक छोटा सा कार्यक्रम करके उनके कपड़े धागुले वगैरह आपस में बदले जाते। इस कार्यक्रम को औ-छौ बांटना कहा जाता था। यह कुछ कुछ दो समधनों के समद्योड़ कार्यक्रम जैसा ही समझिये।

देखा जाए तो हमारे बुजुर्गों ने जिस प्रकार ये रीति रिवाज बनाये, उनका मकसद यही रहा होगा कि लोगों की आपस में आत्मीयता बढ़े। एक दूसरे के मदद की भावना आये, सभी एक दूसरे की खुशियों को अपना समझकर साझा करें। आज के तकनीकी दौर में सब मोबाइल पर सिमट गया है। संवाद न के बराबर है और पुराने बोलचाल के शब्द लगभग गायब हो चुके है। नई भाषाशैली में सब कुछ शॉर्टकर्ट में है तो पहाड़ की भाषाशैली के पुराने वाक्यों, रीतिरिवाजों को कहां जगह मिलेगी। फिर भी अगर हर व्यक्ति के स्तर पर छोटी सी ही सही लेकिन, कोशिश की जाए तो पहाड़ की भाषा, लोकपर्व और उनकी मिठास, एक दूसरे से जुड़ाव ज्यादा गहरा हो सकेगा।

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